HistoryStaticsTourismRTIContactsegRoiw.kZ fyDalएन. आय. सी.
 
 

बुरहानपुर


 ऐतिहासिक और जिले का सबसे बडा़ नगर बुरहानपुर शेख़ बुरहान-उद्-दीन के नाम पर पड़ा । मुम्‍बइ से 504 किमी और खण्‍डवा से 69 किमी दूरी पर मुम्‍बई दिल्‍ली प्रमुख रेल लाइन पर स्थित यह नगर ताप्‍ती नदी के उत्‍तरी किनारे पर स्थित है । नगर में कई ऐतिहासिक  भवन हैं जिनका कला और स्‍थापत्‍य इतिहास में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है । उदाहरणार्थ बीवी की मसजिद, जामी मसजिद, बादशाही किला, नासिरखान और आदिल शाह की मजार, राजा की छतरी, खूनी भण्‍डारा । सिक्‍खों के धार्मिक स्‍थल के रूप में भी बुरहानपुर अपना महत्‍व रखता है । हेण्‍डलूम उद्योग के लिए नगर अपना महत्‍व संजोए है । राजप्रतिनिधियों (वाइसराय) का स्‍थान होने से इस नगर का काफी विस्‍तार किया गया था और इसे बहुत सजाया गया था । आइन-ए-अकबरी में बुरहानपुर का उल्‍लेख उद्यानों की नगरी के रूप में किया गया है, जिसमें कुछ में चंदन उगाया जाता था । जैसा कि उद्योग और बैकिंग, व्‍यापार तथा वाणिज्‍य के अध्‍यायों में बताया गया है, बुरहानपुर को अपने उच्‍च कोटि के मलमल वस्‍त्र निर्माण, सोने के तार खींचने और अन्‍य संबद्ध उद्योगो तथा शिल्‍पों के लिए अंतर्राष्‍टीय ख्‍याति प्राप्‍त थी और यहां का बैंकिंग तथा व्‍यापार का काम यहॉं रहनें वाले सभी राष्‍ट्रों के लोगों व्‍दारा किया जाता था । मुगल शासन के दौरान सन् 1614 ई. में इंग्‍लैंड के जेम्‍स प्रथम व्‍दारा सम्राट जहांगीर के दरबार में भेजे गए राजदूत टामस रो ने बुरहानपुर के शहजादे परवेज से भेंट की थी । सर टामस रो ने अनुमति प्राप्‍त कर शहजादे के फरमान से नगर में एक कारखाना स्‍थापित किया था। विलियम फिंच (1608-11) ने बुरहानपुर को एक बहुत बड़ा और समृद्ध नगर कहा था।  

 
 
 
 

राजा की छतरी

बुरहानपुर से 4 मील की दुरी पर ताप्‍ती के किनारे राजा की छतरी नाम का एक उल्‍लेखनीय स्‍मारक है । ऐसा कहा गया है कि मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश से राजा जयसिंह के सम्‍मान में इस छतरी का निर्माण हुआ था । दक्‍खन में राजा जयसिंह मुगलसेना के सेनापति थे । दक्‍खन अभियान से लौटते समय बुरहानपुर में राजा जयसिंह की मृत्‍यु हो गई थी । कहा जाता है कि इस स्‍थान पर उनका दाह संस्‍कार किया गया था ।

 
 
 
 

इच्‍छादेवी का मंदिर

 बुरहानपुर से 23 किमी दूर बुरहानपुर एदलाबाद मार्ग पर इच्‍छा देवी का मंदिर स्थित है । ऐसी मान्‍यता है कि एक मराठा सरदार ने इच्‍छाओं की पूर्ति करने वाली देवी इच्‍छा से मानता ली थी कि यदि उसे पुत्र की प्राप्ति होती है तो वह इच्‍छादेवी का एक मंदिर और कुआ बनवाएगा । जब उसकी इच्‍छापूर्ति हुई तो उसने एक कुए और मंदिर का निर्माण करवाया ।  इस मंदिर में चैत्रमास में मेला लगता है ।

 
 
 
 

खूनी भण्‍डारा

शुद्ध जल प्रदाय करने की दृष्टि से मुगल शासकों ने आठ जल प्रदाय प्रणालियों का निर्माण करवाया था जिनसे, विभिन्‍न समयों पर इस जन-समपन्‍न नगरी में काफी मात्रा में जल प्रदाय किया जाता था । ये निर्माणकला के अव्दितीय नमूने हैं और इनकी गणना अत्‍यंत व्‍ययसाध्‍य मुगल यांत्रिक कला की पटुता और कुशलता के शानदार अवशेषों में की जाती है । ये संभवत: अधिकांश रूप में शाहजहॉं और औरंगजेब के शासनकाल में बनवाये गए थे । सतपुडा पहाडि़यों से ताप्‍ती नदी की ओर बहने वाले भू‍मिगत स्रोतों को तीन स्‍थानों पर रोका गया है, इन्‍हे मूल भण्‍डारा, सूखा भण्‍डारा और चिंताहरण जलाशय कहा जाता है । ये रेलवे लाइन के पार बुरहानपुर के उत्‍तर में कुछ ही किलोमीटर पर स्थित हैं और शहर की अपेक्षा लगभग 100 फुट ऊंची सतह पर हैं । भूमिगत जल वाहिनियों के इन आठ संघों में से नालियों के रूप में दो संघ बहुत पहले ही नष्‍ट कर दिए गए थे । अन्‍य छह संघों में कईं कुएं हैं जो भूमिगत गैलरियों से संबद्ध है और जो इस प्रकार निर्मित है कि पास की पहाडि़यों से जल का रिसना घाटी के मध्‍य की ओर खींचा जा सके । इस प्रकार पर्याप्‍त जल संग्रहित होने पर वह नगर में या उसके निकटवर्ती स्‍थानों में इष्‍ट स्‍थान तक चिनाई पाइप में ले जाया जाता था । एक संघ से, जो मूल भण्‍डारा कहलाता है, से महल और नगर के मध्‍य भाग में जलपूर्ति की जाती थी, जो कईं वायुकूपकों से युक्‍त लगभग 1300 सौ फुट सुरंग मार्ग ये जाता था ।  जल एक पक्‍के जलाशय, जो जाली करन्‍ज कहलाता है, में छोड़ा जाता था और यहां से मिट्टी के और तराशे गए पत्‍थर के पाइपों के जरिए पानी नगर में विभिन्‍न करंजों और वाटर टॉवरों में पहुंचाया जाता था। सूखा भण्‍डारा जल प्रदाय केंद्र मूलत: पान टाडो और लालबाग के अन्‍य बागों या मुगल सू‍बेदार के विलास के उद्यान की सिंचाई के लिए था ।  सन् 1880 में इसका पानी 3" मिट्टी की पाइप लाइन व्‍दारा तिरखुती करंज से जाली करंज तक नगर की ओर भी लाया गया । 1890 में खूनी भण्‍डारा और सूखा भण्‍डारा से पानी ले जाने वाले पाइपों के स्‍थान पर ढलवां लोहे की पाइप लाइन डाली गई । शेष जल प्रणालियों में से तीन बहादरपुर की ओर जो कि उस समय नगर का एक उपनगर था और छठवीं राव रतन हाड़ा व्‍दारा बनवाये गए महल की ओर ले जाई गई थी । इन जल प्रणालियों पर जहां वे भूमिगत हैं, थोडे़थोड़े अंतराल पर जल के स्‍तर से उपर की ओर पक्‍के पोले स्‍तंभ बनाए गए हैं । ऐसा ही स्‍तंभ जल प्रणाली के उद्गम पर है । 1922 से जल पूर्ति के स्रोत का प्रबंध नगरपालिका बुरहानपुर, जिसकी स्‍थापना 1867 में हुई थी, के पास आ गया ।  

 
 
 
 

दरगाए-ए-हकी़मी

दरगाह-ए-हकी़मी बुरहानपुर से 2 किलोमीटर दूरी पर लोधीपुरा ग्राम में स्थित है । क़ामिली सैय्यदी और मौला-ए-बावा अब्‍दुल का़दिर हकीम-उद्-दीन की स्‍मृति में बनायी गयी इस दरगाह की सुन्‍दरता और इसके आसपास की बाग बगीचे और साफ सफाई से गहन रूहानी सकून (आत्मिक शांति) की अनुभूति होती है और इन्‍सान की अल्‍लाह से नजदीकी का स्‍पष्‍ट अनुभव होता है । बोहरा सम्‍प्रदाय के हजारों तीर्थयात्री प्रतिवर्ष यहॉं आते हैं । अन्‍य मजारों में रोज़- ए- मुबारक और दा-एल-मुतल्‍लक सैय्यदना अब्‍दुल तैय्यब जैन-उद्-दीन साहेब और वली-उल मुर्तज सैय्यद शेख जीवनजी भी यहॉं स्थित है । मजार के पश्चिम में एक खुबसरत मसजिद और हकी़मी बाग भी मौजूद है । बुरहानपुर यात्रा में यह स्‍थल अवश्‍य दर्शनीय है ।

 
 
 
 

शाही हमाम

यह स्‍मारक फारूखी किले के अंदर स्थित है यह मुग़ल बादशाह शाहजहॉं व्‍दारा बनवाया गया था स्‍मारक के बीचों बीच अष्‍टकोणीय स्‍नान कुण्‍ड है। यह स्‍नानकुण्‍ड खूनी भण्‍डारे की जल आपूर्ति प्रणाली से जुडा़ हुआ है । इस स्‍मारक की छतों पर रंगीन मुगल चित्रकला दर्शनीय है ।    
 
 
 

गुरूव्‍दारा

सिक्‍ख धर्म का महत्‍वपूर्ण तीर्थ स्‍थल में से एक, यहॉं का ऐतिहासिक गुरूव्‍दारा एक महत्‍वपूर्ण स्‍थल है । प्रथम गुरू नानक देव जी एवं अंतिम गुरूवार गुरू गोविन्‍दसिंह जी महाराज के पवित्र चरण इस स्‍थल पर पडे़ हैं । ताप्‍ती किनारे राजघाट पर स्थित इस गुरूव्‍द़ारें में गुरू नानक देव जी महाराज आए थे । यहॉं रखे गए पवित्र ग्रंथ गुरू ग्रंथ साहिब पर गुरू नानक देव जी महाराज ने हस्‍ताक्षर भी किए थे । यहॉं  गुरू गोबिन्‍द साहबजी महाराज के अस्‍त्र शस्‍त्र एवं गुरू ग्रंथ साहब के दर्शन भी किए जा सकते हैं । यह गुरूव्‍दारा लगभग 400 वर्ष प्राचीन है और इसकी गणना आनंदपुर(पंजाब), पटना(बिहार) और नांदेड़(महाराष्‍ट्र) के प्रमुख सिक्‍ख तीर्थस्‍थलों में की जाती है ।  बुरहानपुर यात्रा में यह स्‍थल अवश्‍य दर्शनीय है । 

 
 
 
 

असीरगढ

दुर्गम पहाडीस्थित असीरगढ का किला बुरहानपुर से 22 किमी और खण्‍डवा से 48 किमी दूरी प‍र स्थित है, खण्‍डवा-बुरहानपुर रोड पर स्थित है । आधार से इस किले की उचाई 259.1 मीटर तथा औसत समुद्र तल से 701 मीटर है । इसे गेटवे टू सदर्न इण्डिया या दक्षिण का व्‍दार या दक्‍खन का दरवाजा कहा जाता है ।  मध्‍यकाल में इस दुर्गम एवं अभेद्य किले को जीते बिना दक्षिण भारत में कोई शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती थी । इस किले को तीन अलग अलग स्‍तर पर बनाया गया है । उपर वाला परकोटा असीरगढ कहलाता अन्‍य परकोटे कमरगढ और मलयगढ कहलाते हैं ।  किले के अंदर जामी मसजिद, शिव को समर्पित मंदिर और अन्‍य रचनाऐं है । किले के पास में तलहटी में आशादेवी का मंदिर है । असीरगढ गांव के पास ही सुफी संत शाह नोमानी असिरी का मकबरा, किले के वाम भाग में पण्‍ढार नदी के किनारे पर शाहजहॉं की प्रिय मोती बेगम का मकबरा है, जिसे मोती महल नाम से जाना जाता है ।

 

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